प्रणाम साधक मुदित मन भगवत गीता का एक सूप्रसिद्ध शलोक है करमने वा अधिकारस्ते माफलेशु कदाचन ए अर्जन तुम्हारा अधिकार केवल करम में है उसके फल में नहीं है तो अगर हमारा अधिकार करम के फल में नहीं है तो हमारा अधिकार किस में है हमारा अधिकार है हमारे हर करम के संपन होने पे जो आननद की अनुभूती होती है हमारा अधिकार वही तक है वो ही हमारा आननद है हमें जितने भी करम मिलते हैं जो भी करम हमारे समक्ष प्रस्तत होते हैं हम उस पर अपनी उर्जा लगाते हैं और उस उर्जा से वो करम संपन हो जाते हैं कट जाते हैं और संपनता और कटने के बाद हमारे अंदर एक आननद की अनुभूती होती है हमारा अधिकार उसी आननद पे है हम इस अपने स्वता अंदर से उत्पन हुए आननद को छोड़कर हम उस फल की प्राप्ती की अपेक्शा में जो आननद है उसकी तरह भागते रहते हैं और वो फल जो है वो तो अपनी लय स्थिती परिस्थिती के अनुसार फलित होता है उसमें और लोगे करम भी जुड़ते हैं तभी वो फलित होता है और हम अपने ही आननद से वंचित रह जाते हैं तो हम इसी विचार को अपनी साधना में आगे बढ़ाते हैं हम अपनी साधना करेंगे और इस शलोक को और भी सूक्षन स्थल पर ले जाते हैं श्वास लेना भी एक चोटे से चोटे से चोटा करम है जब हम श्वास एक इंहेल करते हैं और श्वास को छोड़ते हैं जैसे ही श्वास छोड़ते हैं हमारा श्वास लेने का करम खतम हो जाता है और जब श्वास लेने का करम खतम हो जाता है एक आनन्द की अनुभूती होती है चोटे से आनन्द की अनुभूती होती है आनन्द अंश की खोज यही है कि हम हर चोटे से चोटे करम के अंत में उसके समापन पर आनन्द के उपर अपनी सजगता डाले हम ओम का उचारण करते हैं हर उचारण समापत होने पर जो आनन्द अंदर से फुरिथ होता है हम उस आनन्द पे अपनी सजगता डाले और हम उस आनन्द की अनुभूती अपने पूरे स्थूल शरीर में करें जब हम स्थूल शरीर में उस आनन्द की अनुभूती करेंगे तो हमारे सूक्ष्म शरीर में भी प्रतिबिम्बित होगा और सूक्ष्म शरीर में प्रतिबिम्बित होने से हमारी सूक्ष्म सत्ताएं प्राकृति की सूक्ष्म सत्ताओं के साथ लैबत हो जाएंगे तो आज की यत्रा शुरू करते हैं बाया हाथ,
दाईना हाथ,
अंगुटे और उसको बहुत ही सहयता से अपनी अराम देव पुजिशन से अपनी गोद में रख ले मन को मुदित कर ले,
सभी विचारों को शान्त कर ले और एक लंबा सा सांस ले सांस को छोड़ दे और धीरे धीरे अपनी आँखें बंद कर ले हर श्वास को छोड़ने पे आनंद की अनुबूति करें लंबा सा सांस ले,
लंबा सा सांस छोड़ दे आँखें बिल्कुल बंद,
अंतर मुखी मन,
अंतर मुखी द्रिश्टी,
दिव्य द्रिश्टी जाग गई और तीसरा कान जाग गया अब हम अपने स्थूल शरीर के अंदर विराजमान हो गए हैं जैसे हम विराजमान होते हैं एक चोटे से अनंद के अंश की अनुबूति होती है अनंद की अनुबूति कन्दे की नसें धीली,
धीली,
धीली गर्दन की नसें धीली,
धीली,
धीली कनपटियों की नसें धीली,
धीली,
धीली पूरा मस्तक शांत,
शांत,
शांत दोनों भुजाएं धीली,
धीली,
धीली कोहनियों के जोड धीले,
धीले,
धीले कलाईयों के जोड धीले,
धीले,
धीले पूरी पीठ शांत,
शांत,
शांत दोनों कूले धीले,
धीले,
धीले जंगाएं धीली,
धीली,
धीली गुटनों के जोड धीले,
धीले,
धीले एडियों के जोड धीले,
धीले,
धीले पैरों के तलवे धीले,
धीले,
धीले पूरा शरीर स्थिर,
पूरा शरीर स्थिर और शरीर की स्थिरता प्राप्त करने पे आनंद की अरुबूती हमने अपना शरीर को स्थिर करने का करम पूरा कर लिया है एक चोटे से आनंद की अरुबूती अब हम अपना दूसरा करम करते हैं श्वासों को धीमा और अलका करते हैं श्वासों को धीमा और अलका करते हैं अपना ध्यान सब जगा से बटोर के अपनी श्वासों पे ले आए हलकी सी श्वास,
सहे श्वास,
नासिका से अंदर जाती श्वास की अरुबूती गर्दर में पहुंच के फेफ़डों को बरती और श्वास की उर्जा हमारी नाभी को चूती अंदर करने वाली श्वास का करम पूरा आनंद की अनुबूती इसी तरह श्वास की उर्जा को हम अपनी नाभी से उठाके अपने फेफ़डों को उपर करते हैं उनको संकुचित करते हैं और उससे श्वास धीमी सी हमारी नासिका से बाहर लिकल जाती श्वास को बाहर करने का करम पूरा आनंद की अनुबूती हलकी श्वास हलकी हलकी हलकी आनंद हलका हलका हलका श्वास धीमी धीमी धीमी श्वास चोटी चोटी चोटी दो श्वासों के बीच का अंतर बड़ा बड़ा बड़ा दो श्वासों के बीच का अंतर बड़ा बड़ा बड़ा दो श्वासों के बीच अमारे चेहरे पे मुस्कान चेहरे पे मुस्कान आनंद की अनुबूती स्थिर शरीर आनंद मै शरीर नियंत्रित श्वास आनंद मै श्वास आनंद मै श्वास नियंत्रित श्वास आनंद मै श्वास मस्तिश के सारे विचार शान शान शान मस्तिश के सारे विचार शान शान शान मस्तिश के सारे विचार शान शान शान सभी कल्पनाएं शान शान शान जो भी कल्पना चल रही है उस कल्पना में हम अपने आनंद के झरणे की बोचार करते है और कल्पना शानत हो जाती है कल्पना शानत विचार शान सभी स्मृतियां शान जो भी स्मृति उठ उठ के आ रही है हम उस पे आनंद की बोचार करते है स्मृतियां शानत हो जाती है मस्तक एकदम स्थिर और शान मस्तक की सतह पे कुई भी तरंग नहीं है और हमारा मस्तक शान इस शानत मन में एक आनंद की अनुभूती एक छोटे से आनंद की अनुभूती आनंद के अण्श की अनुभूती हम तीन करम कर चुके है बहुत छोटे चोटे करम और उन तीनों करम के अंध पे हमें आनंद की अनुभूती हुई है बहुत ही मीठा प्यारा अंदर से स्फुरित होता हमारा मन और हमारे अंदर से उठता आनंद का प्रवाः आनंद ही आनंद पूरे मन में आनंद सभी विचार आनंद मैं सभी स्मृतिया आनंद मैं सभी कलपनाई आनंद मैं अर कलपना में आनंद का सम्मिश्रण आनंद ही आनंद पूरा मस्तक शान शान शान पूरा शरीर स्थे स्थे स्थे श्वास हलकी हलकी अब हम ओम का उच्छारण करेंगे और इस ओम के उच्छारण में आज जब हम करके उच्छारण को स्माप्त करेंगे तो अगला श्वास अंदर लेने से पहले हम एक आनंद की अरभूती करेंगे मैं आनंद शब बोलूंगा बीच बीच में तो अगर हमारा मन भटक गया है तो हम इस आनंद के शब्द का सहारा लेके दुबारा से अपने मन को ओम के उच्छारण के बाद आनंद से बर लेंगे अगला श्वास अंदर लेने से पहले हम एक आनंद की अरभूती करेंगे अगला श्वास अंदर लेने से पहले हम एक आनंद की अरभूती करेंगे अगला श्वास अंदर लेने से पहले हम एक आनंद की अरभूती करेंगे काए नवाचा,
मन से अंदरिया,
बुत्यात्मनावा,
प्रकर्ते सुभावा,
करोमी अधिस्,
सकल परस्वी,
नारायन निति समर्पिता जब हम संपूर्ण समर्पन से अपने कारे की समाप्ति भगवान ईश्वर को समर्पित करते हैं,
नारायन को समर्पित करते हैं हमारा अनन्द और भी प्रगाड हो जाता है,
हमारा अहंकार मिट जाता है और अनन्द प्रगाड हो जाता है तो अगर हम ये दो मंत्र दिन में हर कारे की शुरू में और अंत में करना शुरू कर दें तो हमारे अंदर सूक्ष्म स्थल पे बहुत जादा परिवर्तन आ जाएंगे,
सबसे पहले हम कारे का शुरू करने का स्टार्ट पॉइंट हमारी लाइफ में आ जाएंगे हमको एक सभी शम्ताओं को सीमित करके संग्टित करके हम एक जगापे एकागरता ले आएंगे और जब हम काम कर रहे हैं तो हमारा मन कभी भी उसके फल के परती नहीं भटकेगा,
हमारा मन उस करम को खतम करके नारायन को समर्पन की तरह बढेगा हमारा मन यही करेगा हम इस काम को खतम करें और जब हम आनंद की अनुबूती कर रहे हैं तो हम इस काम का सारा फल नारायन को समर्पत करते हैं काये नवाचा,
काये से वाचना से,
काये नवाचा,
मन से इंद्रिया,
मन से इंद्रियों से,
बुध्यात्मनावा,
बुध्यी और आत्मा से बुध्यात्मनावा,
प्राकृतिय सुभावात,
प्राकृति से भी अपनी सुभाव से भी करो मी अध्यसकल परस्मई,
जो मैं अब क समर्पन करता हूँ,
ये पूरा काम जो मेरा अनुष्ठान जो है,
दिन में चोटे,
चोटे,
चोटे,
चोटे अनुष्ठान होते हैं,
मैं इस अनुष्ठान का पूरा पल आपको समर्पन करता हूँ,
इसको समाप्त करने पे जो मेरे मन में अनुभूती हुई है,
जो अनन्द की अनुभूती हुई है,
मेरा अधिकार केवल वहीं तक है,
जब हम अपने हर कारे को इस फ्रेम ओफ माइंड या मनह स्थिति से करेंगे,
तो हम अर कारे में आनन्द के आण्श की अनुभूती करेंगे,
और जब हम धीरे धीरे दिन के सभी दिन चर्या के अर नित्य निमित प्रारब्ध कोई भी काम को करेंगे,
उसमें आनन्द की अन� सारा दिन पुलकित रहेगा,
पूरा शरीर सारा दिन पुलकित रहेगा,
हम आनन्द में रहेंगे,
हम आनन्द की लहरों पर धीरे धीरे तैरते रहेंगे,
आनन्द की के प्रवाह में बहते रहेंगे,
और जब आनन्द के प्रवाह में बहते रहेंगे,
तो ये काम अपने आप होने शुरू हो जाएंगे,
हम द्रिष्टा बन जाएंगे,
हमारी और अंदर से आंतरिक प्रगती होगी,
हमारा आत्म बोध पड़ेगा.
इस विचार का मनन करें और इस विचार पे थोड़ा अपने आप इसका निधिदासन भी करें,
श्रवन मनन,
निधिदासन.
इसमें मनन करें इसके उपर,
कि मेरा अधिकार अगर करम के फल पे नहीं है,
तो मेरा अधिकार उस करम को समाप्त करने के आनंद में है और वो आनंद मैं नारायन को समर्पन करूँगा.
वो आनंद मैं समर्पन करता हूँ और उसके लिए बहुत ही प्रगाड और बहुत ही अच्छा और बहुत ही प्रभावशाली मंत्र है.
काये नवाचा मन्से इंद्रिया बुद्यात्मनावा प्रकर्ते सभावा करो में यद्य सकलपरस्मी नारायनिती समर्पयामी नारायनिती समर्पयामी आज के लिए सादक इतना ही कल सुबह फिर मिलेंगे एक और सीडी उपर चड़ेंगे और हम अपने ध्यान को और प्रगाड करेंगे आपका दिन मंगलमय हो आपके हर काम में आनंद के अंश की अनुबूती हो इसी प्रार्थना से मैं आपसे एक आज्या लेता हूँ ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है धन्यवाद सादक