20:00

आप शरीर नहीं हैं: अद्वैत वेदांत का रहस्य

by Mayur Katariya

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5
Type
guided
Activity
Meditation
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Everyone
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इस मार्गदर्शित ध्यान के माध्यम से अनुभव करें श्री निसर्गदत्त महाराज के अद्वैत ज्ञान की गहराई। उनकी वाणी आपको आत्मचिंतन की एक गहरी यात्रा पर ले जाएगी — जहाँ विचार शांत होते हैं, पहचान मिटती है, और केवल शुद्ध जागरूकता शेष रह जाती है। पृष्ठभूमि में मधुर और शांत संगीत आपकी आंतरिक शांति को और गहरा करता है। यह ध्यान विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो: - स्वयं की पहचान को समझना चाहते हैं - 'मैं कौन हूँ?' का उत्तर पाना चाहते हैं - ध्यान, मौन और जागरूकता का अभ्यास करना चाहते हैं - अद्वैत वेदांत के रहस्यों में उतरना चाहते हैं

Non DualitySelf RealizationDetachmentImpermanenceInner PeaceEgo TranscendenceSpiritual DedicationExistential InquiryIllusion Of RealityInner FulfillmentMeditationAwarenessAdvaita Vedanta

Transcript

आप सबी भीग गए हो क्योंकि आपकी दुनिया में हमेशा तेज बारिस होती हैं मेरी दुनिया में हमेशा अच्छा मौसम रहता है वहां न रात है न दिन न गर्मी है न ठंड मुझे वहां कोई चिंता नहीं सताती मेरा मन विचारों से मुक्त है क्योंकि वहां कोई इच्छा नहीं है जिनें पूरा करने के लिए मैं गुलाम बनू आपकी दुनिया अस्थाई और परिवर्टनशेल है मेरी दुनिया पूर्ण और अपरिवर्टनिया है आप अपनी दुनिया के बारे में मुझे कुछ भी बता सकते हो मैं ध्यान से सुनूंगा भी,

साइड रूची भी रखूंगा लेकिन एक पल के लिए भी मैं यह नहीं बुलूंगा कि आपकी दुनिया वास्तव में नहीं है आप सपना देख रहे हो मेरी दुनिया का ऐसा कोई आकार,

रूप या रेखा नहीं है जिससे इसे पहचाना जा सके आप इसके बारे में कुछ नहीं कह सकते हो बस मैं हूँ का सास्वत भाव,

बस यही मेरी दुनिया है यह संपन और संपुर्ण दुनिया है मैं हूँ हर छाप यहां मिच चुकी है,

हर अनुभव अवस्विकार किया जा चुका है मुझे कुछ भी नहीं चाहिए,

यहां तक कि मैं भी नहीं चाहिए क्योंकि मैं खुद को कपी खो ही नहीं सकता हूं,

तो फिर चाहने की भावना कहा?

आपकी दुनिया में संगर्श है,

लेकिन मेरी दुनिया में सास्वत मौन है,

मेरा मौन गाता है मेरा खालीपन भरा हुआ है,

मुझे किसी चीज की कमी नहीं है,

आप मेरी दुनिया को तब तक नहीं जान सकते,

जब तक आप यहां खुद नहीं आ जाते आपने पुछा कि क्या मैं अपनी दुनिया में अकेला हूँ?

यह शब्द लागू ही नहीं होता है,

तो आप अकेला या न अकेला कैसे कह सकते हो?

बे शक मैं अकेला हूँ,

क्योंकि मैं का भाव ही सब कुछ है,

मेरी दुनिया में ना आना है ना जाना,

यह तो केवल शब्द है,

मैं कहां से जाओंगा और कहां से आओंगा?

आप अपनी दुनिया पर अधिक ध्यान दे,

इसे सावधानी से जाचे और अचानक एक दिन आप खुद को मेरी दुनिया में पाओगे,

लेकिन आपको वहां भी कुछ हासिल नहीं होगा,

आप सिर्फ जो आपका नहीं है,

उसे छोड़ दोगे,

और जो आपने कभी नहीं खोया,

अपने वह अस्तितों को आप जाच पाओगे,

जान पाओगे.

मेरी दुनिया में ना कोई सासक है,

ना कोई शासित,

यहां कोई द्वैत्य नहीं है,

मतलब यहां कुछ भी दूसरा नहीं है,

बस एक ही है,

मैं हूँ का सुद्ध सास्वत अनुभव.

आपकी दुनिया के सासकों की धारणा केवल आपकी अपनी कलपना है,

आपके शास्त्र और देवता यहां कोई अर्थ नहीं रखते.

आपकी दुनिया में मैं एक नाम,

एक आकार और एक गतिविती प्रदर्शित करता हुआ दिखता हूँ,

पर मेरी दुनिया में मैं केवल शुद्ध अस्तित्व हूँ,

और कुछ नहीं.

आपकी संपती और गुणों के बारे में धारणा आपको अमीर होने की कलपना देती है.

मैं पूरी तरह से इन कलपनाओं से मुक्त हूँ.

अपनी दुनिया को वैसे देखे जैसी वह वास्तव में है,

न कि जैसी आपने कलपना कर रखी है.

क्या समझदारी ही आपको वेराज्य,

Detachment की और ले जाएगी?

वेराज्य आपसे सही साधना और सही कर्म कराएगा.

सही साधना और सही कर्म आपके वास्तविक अस्तिद्व तक एक आंतरिक पूल का निर्मान करेगा.

सही साधना आपके समर्पन का प्रमान है.

जो आपको कहा गया है,

उसे महनत और विश्वास श्रद्धा के स्राथ करें और मार्ग की सभी बाधाएं विलुप्त हो जाएगी.

अगर मैं आपकी दुनिया में होता तो सबसे ज़्यादा दुखी हो जाता,

खाने के लिए उठना,

फिर बाते करना और फिर से सो जाना,

क्या जंजट है?

जीना और मरना,

ये दोनों कितने निरर्थक शब्द है.

जब आप मुझे जीवित देखते हो,

मैं मृत हूँ और जब आप सोचते हो कि मैं मृत हूँ,

मैं जीवित हूँ,

आप कितने उलजे हुए हो.

आपकी समस्याओं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं करना है.

वे आती हैं और खुद ही चली जाती हैं.

चाहे समस्या सारेरीक हो,

भावनात्मक हो या मानसिक हो,

ये हमें सव्यक्तिगत होती है.

पड़ी कुदरती आपदाय असंख्य व्यक्तिगत नियतियों का योग है और उन्हें सुलजाने में समय लगता है.

लेकिन मृत्यों कोई आपदा नहीं है.

आपकी दुनिया और मेरी दुनिया के बीच किसी पूल की आवश्यक्ता नहीं है.

जैसे वास्तविक और काल्पनिक दुनिया के बीच किसी कड़ी की आवश्यक्ता नहीं होती है.

क्यूंकि ऐसा कोई पूल हो ही नहीं सकता,

जो वास्तविक को काल्पनिक के साथ जोड़ दे.

सिफ वास्तविक है और काल्पनिक नहीं है.

आपकी गल्ती आपके इस विश्वास में है कि आपका जन्म हुआ है,

पलकी आपका जन्म कभी हुआ ही नहीं है.

नहीं,

आप कभी मरोगे.

लेकिन आप मानते हो कि आपका जन्म किसी निष्चित तारीक और स्थान पर हुआ था और एक विशेश शरीर ही आपका अपना है.

अपनी दुनिया की जाज करे,

अपने मन को इसमें लगाए,

इसे सावधानी से देखे,

हर विचार को गहराई से जाज करे,

यही परियाप्त है.

मेरा अनुबव है कि सब कुछ आनन्द है,

लेकिन आनन्द की इच्छा वही दर्द उत्पन करती है.

इसी तरह आनन्द दर्द का बीज बन जाता है.

सारे दुखों का ब्रह्मान्द इच्छा से उत्पन होता है,

तो सुक की इच्छा छोड़ दे और आप दर्द को जान भी नहीं पाओगे.

आप दुनिया की चिंता क्यों करते हों?

जबकि पहले खूद की देखबाल करना सिखना चाहिए.

आप दुनिया को बचाना चाहते हों है न?

क्या आप खूद को बचाये बिना दुनिया को बचा सकते हों?

और बचाना मतलब क्या?

ब्रह्म से बचना.

मृत्यू का अर्थ है चीजों को वैसे देखो जैसी वो है.

मैं वास्तव में अपने आप को किसी भी चीज से संबंधित नहीं देखता हूं,

यहां तक कि मैं मैं से भी संबंधित नहीं हूं.

यह मैं,

यह स्वयम,

चाहे कुछ भी हो,

पर मैं सदेव अपरिभाशित रहता हूं.

मुझे सच में खुद को किसी से भी या किसी चीज से भी संबंधित नहीं बनना हैं,

यहां तक कि खुद से भी नहीं,

चाहे वह स्वयम कुछ भी हो.

मैं हमेशा अपरिभाशित रहता हूं.

मैं भीतर हूं और भीतर के बाहर भी हूं.

मैं अंगत हूं,

मैं नीजी हूं और पहुँच से भी परे हूं.

अपने गुरू में विश्वास के कारण में यहां तक पहुचा.

उन्होंने मुझसे कहा कि केवल तुम हो और मैंने उन पर शक नहीं किया.

मैं बस इसे समझने की कोसिस करता रहा.

जब तक मैंने यह महसूस नहीं किया कि यही पुर्ण शत्य है कि मैं हूं.

आत्मसाक्षातकार के बारे में मैंने पाया कि मैं चेतन्य हूं और पुर्ण रूप से आनंदित हूं.

और यह केवल मेरी गलती थी कि मैंने सोचा कि मेरा अस्तित्व,

चेतना और आनंद मेरे शरीर और दुनिया भर के शरीरों पर निर्भर है.

मेरी गुरू ने मुझे हर चीज पर पुरी तरह से शक करना सिखाया.

उन्होंने कहा कि अपने अस्तितों को छोड़ कर हर चीज को अस्विकार कर दो.

इच्छा के मात्यम से आपने इस दुनिया को इस के सुक और दुख के साथ बना दिया है.

आप जिसे सुक कहते हो,

वह सुक सिमित और अस्थाई होता है.

दुख से ही सुक की इच्छा उत्पन होती है और यह दुखी इच्छा अपनी पूर्ती की तलास करती रहती है और निराशा और हतासा के दर्द में समाप्त भी हो जाती है.

सुक के पीछे हमेशा दुख छिपा होता है और सभी सुक की खोज दुख से शुरू होती है और दुख में ही समाप्त हो जाती है.

इस से क्या फर्क पड़ता है कि आपका मन शुष्ट है या असांत है?

यह मन ही है जो शुष्ट है या असांत है,

यह आप नहीं हो.

देखे इस कमरे में कई चीजे हो रही है,

क्या मैंने इन्हे होने के लिए कहा है?

विबस हो रही है.

आपके साथ भी ऐसा ही है,

नियती खुद को प्रगट कर रही है और जो निष्चित है उसे साकार कर देती है.

आप घटनाओं के क्रम को नहीं बदल सकते,

लेकिन आप अपना दृश्टि कों बदल सकते हो और जो वास्तव में माइने रखता है,

वह दृश्टि कौन है,

ना कि घटनाएं.

दुनिया इच्छाओं और भई का जन्मस्थान है.

आप इसमें शान्ति नहीं पा सकते.

शान्ति के लिए आपको दुनिया से परे जाना होगा.

दुनिया की जड़ जूते मैं और जूते मैं के प्रेम में हैं,

मतलब अहंकार में हैं.

इसे कारण हम सुख चाहते हैं और दुख से बचते हैं.

अहंकार को आत्मा के प्रेम से बदलें और पूरी तस्विर बदल जाएगी.

एक दिन ऐसा आएगा जब आपने परियाप्त घ्यान इखटटा कर लिया होगा और आपको आत्मनिर्माण शुरू करना होगा.

तब हर एक चीज को चांटे और जो बिल्कुल जरूरी है उसे ही रखें.

हर चीज की गहराई से जाँच करें और जो गहर जरूरी है उसे निर्दैता के साथ नस्थ कर दें.

ऐसा कभी नहीं होगा कि आपने ज्यादा चीजे नस्थ कर दें.

मुझ पर विश्वास रखें.

क्यूंकि वास्तविक्ता में किसी चीज का कोई वास्तविक मुल्य नहीं है.

बस वेराज्य के परती अपना राग रखें.

मैं हूँ के सास्वत भाव में स्थापित रहें.

और फिर एक दिन आएगा जब आप उससे भी परे चले जाओगे,

वेराज्य में.

और इस दुनिया में कोई बारिस नहीं है,

यहां कोई दिन या रात नहीं है,

यहां हमेसा अच्छा मौसम है.

यही मैं हूँ का सास्वत भाव है.

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Mayur KatariyaMelbourne, Australia

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